भारत की आध्यात्मिक और धार्मिक परंपरा में अनेक ऐसे संत, महात्मा और धर्मगुरु हुए हैं जिन्होंने समाज को मार्गदर्शन दिया और लोगों को धर्म, संस्कृति तथा अध्यात्म की राह पर चलने के लिए प्रेरित किया। ऐसे ही महान संतों में से एक थे जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती। वे द्वारका-शारदा पीठ एवं ज्योतिष्पीठ बदरीनाथ के शंकराचार्य थे। स्वामी जी ने अपना जीवन धर्म की रक्षा, समाज सुधार और वेदांत के प्रचार-प्रसार में समर्पित कर दिया।
जन्म |
पोथीराम उपाध्याय 2 सितम्बर 1924 सिवनी, मध्य प्रदेश, (भारत) |
मृत्यु |
11 सितम्बर 2022 नरसिंहपुर, मध्य प्रदेश, (भारत) |
धर्म |
हिन्दू |
राष्ट्रीयता |
भारतीय |
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जन्म 2 सितंबर 1924 को मध्यप्रदेश के दिगौरी गाँव, जिला सीहोर में हुआ था। उनका जन्म नाम पोटलराम उपाध्याय था। बचपन से ही उनमें धार्मिक झुकाव था और वे ईश्वर भक्ति तथा आध्यात्मिक साधना में गहरी रुचि रखते थे।
कम उम्र में ही उन्होंने साधु-संतों की संगति में समय बिताना शुरू कर दिया। केवल 9 वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने घर त्याग कर संन्यास का मार्ग चुन लिया और आगे चलकर ‘स्वामी करपात्री महाराज’ के सानिध्य में अध्ययन किया।
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती केवल एक धार्मिक गुरु ही नहीं, बल्कि एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे। महात्मा गांधी के नेतृत्व में चल रहे ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (1942) में उन्होंने सक्रिय रूप से भाग लिया और 19 वर्ष की आयु में ही ब्रिटिश हुकूमत द्वारा जेल भी भेजे गए।
इस प्रकार उन्होंने न केवल धार्मिक जीवन अपनाया बल्कि देश की स्वतंत्रता के लिए भी त्याग और संघर्ष किया।
स्वामी स्वरूपानंद ने अद्वैत वेदांत, वेद, उपनिषद और शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। उन्हें 1950 के दशक में ‘दंडी संन्यासी’ की उपाधि प्राप्त हुई। आगे चलकर उन्हें जगद्गुरु शंकराचार्य की परंपरा में 1973 में द्वारका शारदा पीठ और ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।
उनका व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली और विद्वत्तापूर्ण था। उन्होंने हमेशा सनातन धर्म की रक्षा और प्रचार को अपना कर्तव्य माना।
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के विचार गहरे और स्पष्ट थे। उन्होंने समाज को यह सिखाया कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की संपूर्ण शैली है।
स्वामी स्वरूपानंद केवल उपदेशक ही नहीं थे, उन्होंने समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए कई कार्य किए।
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने लंबा और सक्रिय जीवन जिया। 11 सितंबर 2022 को मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर ज़िले के परमहंसी गंगा आश्रम (झोतेश्वर) में उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। उस समय वे 98 वर्ष के थे।
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती एक ऐसे संत थे जिन्होंने अपने जीवन से यह साबित किया कि धर्म और राष्ट्रभक्ति दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। वे केवल शंकराचार्य ही नहीं, बल्कि समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी और सच्चे आध्यात्मिक गुरु थे। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा।