जब किसी अर्थव्यवस्था में लगातार दो तिमाहियों तक ख़र्च या निर्यात सिकुड़ जाता है तो माना जाता है कि मंदी आ गई है। पिछले साल अक्तूबर और दिसंबर के बीच, ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में 0.1 फ़ीसदी की बढ़त देखी गई थी। पिछले महीने का डेटा बताता है कि जनवरी में इस अर्थव्यवस्था में इतनी ही गिरावट देखी गई।
ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था ने फ़रवरी में कैसा प्रदर्शन किया, इसका पहला अनुमान इस शुक्रवार को जारी किया जाएगा।
तो जहाँ तक ब्रिटेन की बात है, हमें अभी और आंकड़ों का इंतज़ार करना होगा।
लेकिन ये तो बिल्कुल साफ़ है कि दुनिया भर के शेयर बाज़ारों में हुई मार धाड़ से चिंताजनक नुकसान हुआ है।
बैंकों को आमतौर पर अर्थव्यवस्था के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जाता है। बाज़ार के एक विशेषज्ञ ने आज कहा, "एक बात जिसकी वजह से मेरी सांसें अटकी, वो है बैंकों के शेयरों में गिरावट।"
एचएसबीसी और स्टैंडर्ड चार्टर्ड ऐसे दो बड़े बैंक हैं जो पूर्वी और पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं के बीच सीढ़ी की तरह काम करते हैं। इन दोनों ही अहम बैंकों में 10 फ़ीसदी की गिरावट आई। बाद में थोड़ी बहुत ख़रीदारी की बदौलत इन दोनों की हालत सुधरी।
लेकिन चिंता सिर्फ़ शेयर बाज़ारों में मची उठा पटक की ही नहीं है। फ़िक्र की बात तो कमोडिटी एक्सचेंजों को लेकर है। उनमें भी चेतावनी के संकेत दिख रहे हैं। तांबे और तेल की क़ीमतों को वैश्विक आर्थिक सेहत का बैरोमीटर माना जाता है। ट्रंप के टैरिफ़ की घोषणा के बाद तांबे और तेल की क़ीमतों में 15 फ़ीसदी से ज़्यादा की गिरावट आई है।
दुनिया में आर्थिक मंदी आना आम घटना नहीं है। दरअसल 'वास्तविक मंदी' के दौर काफ़ी कम रहे हैं।
अब तक तीन ऐसे दौर रहे हैं जिन्हें मंदी कहा गया है -
इस बार भी ऐसा ही कुछ हो इसकी संभावना फ़िलहाल कम है। लेकिन ज़्यादातर आर्थिक विश्लेषकों की नज़र में अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ में मंदी की आशंका बरक़रार है।⏹